सिर्फ 'बहादुर' नहीं हैं नेपाली


शनिवार, 15 सितंबर, 2012 को 16:49 IST तक के समाचार
भारत में नेपाली
भारत मे रहने वाली नेपालियों की एक बड़ी आबादी कई तरह के व्यवसाय से जुड़ी हुई है.
कुछ समय पहले तक नेपाल से भारत काम करने आए नेपालियों को सिर्फ एक नाम से पुकारा जाता था और वो था ‘बहादुर’.
ऐसा इसलिए होता था कि इनमें से ज्य़ादातर लोग चौकीदार, वेटर या ड्राईवर जैसे छोटे-मोटे काम किया करते थे.
लेकिन कड़ी मेहनत के बलबूते नेपाल से आए कई लोग अब भारत में सालाना करोड़ों का व्यापार कर रहे हैं.
ईश्वर प्रसाद पंगेनी 30 साल पहले नेपाल के अपने गांव को छोड़कर भारत आए थे. तब वे 13 वर्ष के थे.
एक घर में नौकर के तौर पर काम करते हुए उन्हें उनकी पहली पगार 50 रुपये मिली थी.
लेकिन आज वो दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में ईश्वर ट्रैवल्स नाम के नाम से एक कंपनी चलाते हैं. उन्होंने 20 से अधिक लोगों को काम पर रखा हुआ है.
ईश्वर के पास 18 कारें हैं जिन्हें वे दिल्ली और आसपास घूमने आए पर्यटकों को किराए पर देते हैं.
ईश्वर पंगेनी बताते हैं, ‘’मैंने 1991 में अपना खुद का काम शुरु किया था. तब से मैंने ट्रांसपोर्ट और पर्यटन के काम पर अपना पूरा ध्यान लगा दिया है. मैंने जीवन में कभी कोई योजना नहीं बनाई पर जो कुछ भी मुझे मिला उसे स्वीकार कर लिया.’’
दिलचस्प
"मैंने 1991 में अपना खुद का काम शुरु किया था. तब से मैंने ट्रांसपोर्ट और पर्यटन के काम पर अपना पूरा ध्यान लगा दिया है. मैंने जीवन में कभी कोई योजना नहीं बनाई पर जो कुछ भी मुझे मिला उसे स्वीकार कर लिया"
ईश्वर पंगेनी, ट्रैवल्स कंपनी के मालिक
ऐसे ही एक और व्यक्ति हैं दिलीप शर्मा जो 40 साल पहले 12 साल की उम्र में भारत आए थे.
भारत आने के बाद दिलीप कई वर्ष तक एक जूते की फैक्ट्री में काम करते रहे फिर उन्होंने कुछ अपना काम करने का निर्णय लिया.
अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने जूते और चप्पल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सांचे की फैक्ट्री लगाई.
दिल्ली के त्रिनगर में उन्होंने 'योगा इंटरप्राईज़ेज' नाम की फैक्ट्री लगाई जिसमें हर साल लाखों रुपयों का व्यापार होता है और वहाँ क़रीब 30 मज़दूर काम करते हैं.
दिलीप शर्मा कहते हैं, ''मेरी फैक्ट्री में बने सामान नेपाल के अलावा दिल्ली और कोलकाता की कई फैक्ट्रियों में भी भेजे जाते हैं.''
ऐसे ही एक और व्यापारी माधव रेगमी हैं, जो दिल्ली के मोती नगर में रेगमी प्लास्टिक उद्योग नाम से प्लास्टिक बैग और दूसरे सामान बनाते हैं.
नेपाल लौटने की इच्छा
रेगमी फैक्ट्री
दिल्ली के त्रिनगर स्थिर रेगमी फैक्ट्री में प्लास्टिक का सामान बनाया जाता है
हालांकि ये सभी व्यापारी चाहते हैं कि वे एक दिन अपने देश नेपाल में भी अपना काम शुरु करें लेकिन फिलहाल वे भारत में काफी संतुष्ट हैं.
फ़िलहाल नेपाल न जा पाने की एक वजह वो नेपाल में व्यापार के अनुकूल माहौल ना होना बताते हैं.
ईश्वर प्रसाद पंगेनी के अनुसार, ''एक बार मैंने नेपाल में भी बिज़नेस शुरु करने की कोशिश की थी, लेकिन वहां लगातार होने वाले बंद और हड़ताल के कारण मुझे काफी नुकसान उठाना पड़ा और मैं वापस दिल्ली चला आया.''
पंगेनी, शर्मा और रेगमी की तरह कई और नेपाली हैं जो भारत में रियल स्टेट और ट्रैवल एजंसी का काम करते हैं.
ये ऐसे कुछ लोग भारत में नेपालियों को लेकर समाज में बनी धारणा को भी तोड़ने में सफल हुए हैं.
इसके बावजूद आज भी करीब लाखों नेपाली ऐसे हैं जो छोटे-मोटे काम और मज़दूरी करके ही अपना गुज़ारा करते हैं.
उनके यहां आने की वजह नेपाल में रोज़गार के कम अवसर है और वे भारत इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें आसानी से रोज़गार मिल जाने की आस होते हैं और फिर भारत आना आसान भी है